अम्बाला, हरियाणा, तरूण शर्मा : निजी स्कूलों के प्रबन्धको के फैसलों से परेशान बच्चों के अभिभावकों ने अपनी समस्याओं से जनता व सरकार को अवगत कराने के लिए एक प्रेसवार्ता कच्चा बाज़ार में इनैलो प्रदेश प्रवक्ता ओंकार सिंह के निवास पर की जिसमे सेसिल कान्वेंट, डीएवी रिवरसाइड, लार्ड महावीर जैन स्कूल, सेंट जोसेफ स्कूल, पीकेआर जैन स्कूल, मेजर आर एन स्कूल व अन्य स्कूलों के बच्चों के अभिभावक शामिल हुए। इस अवसर पर पीकेआर स्कूल से नवीन भारद्वाज जी ने स्कूल प्रबंधन द्वारा की जा रही नाजायज वसूली के बारे में बताया। सेसिल कान्वेंट स्कूल की तरफ से जतिन छाबड़ा ने बताया कि स्कूल प्रबंधक वार्षिक चार्ज को ट्यूशन फीस में शामिल करके 12 किश्तों में वसूली के लिए दबाव बना रहे हैं वहीं वंदना कौशल न बताया कि उनके बच्चों को फीस न देने के कारण क्लास से रिमूव कर दिया था जिसे बाद में विरोध करने पर पुनः दाखिल किया गया। मेजर आरएन कपूर से पंकज मल्होत्रा ने बताया कि कोरोना काल मे भी स्कूल वाले ट्यूशन फीस में वृद्धि करके व्सलि कर रहे हैं। गौरव मन्डान ने स्कूल की अधिक वसूली की निंदा करते हुए कहा कि निजी स्कूलों ने शिक्षा को व्यपार बना दिया है। सभी ने विचार करके सर्वसहमति से ‘स्कूल अभिभावक परिवार मंच’ के गठन की घोषणा की जिससे कानूनी व अन्य मंचो पर अभिभावकों की लड़ाई एकजुट होकर लड़ी जा सके। एक सांझ फंड का गठन भी किया गया ताकि कानूनी लड़ाई के लिए आवश्यक पैसों की पूर्ति हो सके या अवसर पर ओंकार सिंह ने सबसे पहले फंड में 50000 रुपये देने की घोषणा की और कहाकि कोरोना काल मे सरकारी कर्मचारी व समाज के उच्च वर्ग को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति परेशान हैं। सरकार हरसप्ताह नई नई शर्तो के साथ लॉकडाउन तो बड़ा रही है लेकिन पीड़ित जनता को कोई राहत नही दे रही। काम धंधे बन्द होने व आर्थिक मंदी के दौर में अभिभावकों को अपने बच्चे पढ़ाने मुश्किल हो गए हैं, निजी स्कूलों द्वारा कोरोना काल मे भी 10प्रतिशत फीस बढ़ाने का फैसला और फीस जमा न करवाने की सूरत में बच्चों का नाम ऑनलाइन क्लास व स्कूल से काट देना या काट देने की धमकी देना अभिभावकों को परेशान व पड़ताडित कर रहा है लेकिन बहुत अफसोस कि बात है कि हमारे शिक्षामंत्री मूक दर्शक बने हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति का एक ही सपना होता है कि अपने बच्चों को उत्तम शिक्षा दिलाकर अच्छे नागरिक बनाया जाए और बच्चे तो इस देश का भविष्य है इसलिए सरकार की प्राथमिक जिम्मेवारी है शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा का अधिकार देने की बात तो की जाती है लेकिन धरातल पर सरकारी स्कूलों की खस्ताहाल स्तिथि के कारण कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना नही चाहता और निजी स्कूलों ने शिक्षा के नोबल कार्य को व्यपार बना दिया है। कोरोना काल मे फीस वृद्धि, वार्षिक शुल्क, एडमिशन फीस, ट्यूशन फीस में हिडन चार्ज, ऑनलाइन क्लास के बावजूद कंप्यूटर क्लास व स्मार्ट क्लास के नाम पर अतिरिक्त फीस वसूली जैसी अनेक समस्याओं से प्रत्येक व्यक्ति पीड़ित हैं जबकि कोरोना संक्रमण काल दौरान लॉकडाउन व ओवरआल आर्थिक मंदी के कारण अधिकतर लोगों के रोजगार खत्म हो गए हैं और काम धंधे चौपट। सरकार बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा तो दे रही है और बेटियों को फीस की कमी के कारण स्कूलों से निकला जा रहा है। ऐसे में सरकार का नैतिक कर्तव्य व राजधर्म हैं कि संकटकाल में जनता की रक्षा, सुरक्षा व पालन पोषण करना। स्कूल सम्बन्धी अभिभावकों की समस्या का एकमात्र व समुचित हल है कि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड व मोडर्न बना कर निजी स्कूलों जैसी तमाम सुविधाओ से सम्पन्न करना और ऐसा कानून बना देना कि चपरासी से लेकर राष्ट्रपति तक प्रत्येक सरकारी कर्मचारी व सरकारी व सविंधानिक पदों पर पैठे एमएलए, एमपी, चेयरमैन, मंत्री, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री के व उनके परिवार के बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला अनिवार्य कर देना। जब डीसी, एसपी, एसडीएम, तहसीलदार, सचिव, मुख्यचिव व अन्य उच्चाधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला लेंगे तो सरकारी स्कूलों के हालात अपने आप सुधर जाएंगे और आम आदमी में सरकारी स्कूलों के परतीं आकर्षण पैदा होगा लेकिन यहां आलम यह है कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों व मुख्याधियापको के बच्चे भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं और मंत्रियों और उच्च व सविधानिक पदाधिकारियों के बच्चे तो विदेशों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। प्राइवेट व विदेशी शिक्षा स्टेट्स सिंबल बन गया है। निजी स्कूलों के अभिभावकों का शोषण कोई नई बात नही है, इस सम्बन्धी अनेक विवाद अनेक उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में भी गए हैं लेकिन साधन सम्पन्नता व मजबूत आर्थिक स्तिथि के कारण निजी स्कूल प्रबंधक अच्छा व बढ़िया अधिवक्ता करने में सक्षम होते हैं जिसके कारण वो न्यायपालिका में अपना पक्ष मजबूती से रखकर अपने हितों की रक्षा कर लेते हैं वहीं दूरी तरफ अभिभावक एकजुट न होने के कारण कमजोर साबित हो जाते हैं जबकि यहां पर सरकार की नैतिक जिम्मेवारी बनती है कि कमजोर पक्ष को उचित न्यायिक सहायता प्रदान की जाए ताकि निष्पक्ष व सर्वोचित निर्णय मिल सके लेकिन दूषित व्यवस्था में ताकतवर और धनाढ्य व्यक्तियों का सत्ता से गठजोड़ होता है और गरीब व कमजोर व्यक्ति पिस्ता है इसलिए सरकार का नैतिक कर्तव्य व राजधर्म है की नागरिकों को उच्च दर्जे की शिक्षा व्यवस्था कर ताकि देश का भविष्य स्वर्णिम हो सके। उच्च शिक्षा के मामले में स्तिथि बिल्कुल विपरीत है। पंजाब यूनिवर्सिटी, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी, आईआईटी, आईआईएम व अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रत्येक व्यक्ति अपने बच्चों को दाखिल करवाना चाहता है जबकि ये संस्थान भी सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त है। एक रोचक तथ्य यह भी है कि सरकारी स्कूलों व कॉलेजों के अध्यापकों का वेतन हज़ारों लाखो में होता है और रिटायर होने के पश्चत पेंशन व्यवस्था भी है जबकि इन स्कूलों की आमदन जीरो है वहीं दूसरी तरफ अधिकतर निजी स्कूलों में अधियापको को मात्र पांच, दस, पंद्रह हज़ार ही वेतन मिलता है और रिटायरमेंट लाभ भी नही मिलते। वहां अधियापको व स्टाफ का भी शोषण होता है लेकिन सरकार कोई कदम नही उठाती। सरकार को शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करके उत्तम शिक्षा के प्रयास करने चाहिए ताकि देश का भविष्य उज्ज्वल हो सके। इस अवसर पर डॉक्टर रामनाथ, अशोक धवन, गुरप्रीत सिंह, हरीश अरोड़ा, नवीन भरद्वाज, अमित अग्रवाल, सोनू सेठी, संजीव अत्री, मोनू चावला, राकेश कटारिया, अमित दुआ, भारत, गोरव मन्डान, राजू खेतरपाल, हैप्पी ग्रोवर, संजीव भारद्वाज, गुरविंदर सिंह, वंदना कौशल, अनामिका, सुनील पॉल, गगन सिंह, सुमित गुप्ता, जतिन छाबड़ा, संजीव, विशाल, अमनदीप, जगदीश, ओम नारायण, दीपक, अनूप, सुनील कुमार, गुरसेवक सिंह, अम्पू गुप्ता और बहुत से अभिभावक शामिल हुए।
स्कूल अभिभावक परिवार एकता मंच का गठन हुआ, ओंकार सिंह ने 50000 रुपये योगदान दिया
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